विजयनगर-एक भव्य हिन्दू साम्राज्य
विजयनगर-एक भव्य हिन्दू साम्राज्य जो अब भारतीय इतिहास की पुस्तकों से हो चुका है गायब😫😫😪😪जिन वीरों के स्मरण मात्र से ही भुजाएं फाडक उठती हैं , जिनके शौर्य की गाथा भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर ने गई थी . जिनके तलवार के आगे संसार सर झुकाता था , जिनके इतिहास के स्मरण मात्र से शक्ति और ऊर्जा का संचार होता था वो सारे के सारे मूल और जड़ एक सोची और समझी रणनीति के तहत खोदी गयी और हमें केवल इतिहास के नाम पर पकड़ा दिया गया एक ऐसा घुनघुना जो मात्र दो या तीन लोगों के ही आस पास बजता रहा जिसमे हमने बस यही जाना कि धर्म से निरपेक्षता और अहिंसा ही हमारे जीवन का और इतिहास का आधार रहे हैं .. इस पूरे इतिहास में ऐसे वीरों को एक एक कर के निकाल दिया गया जिनके नाम से कभी विदेश में बैठे बड़े बड़े आक्रान्ता भी हिल जाया करते थे . चाटुकार इतिहासकारों की चाटुकारिता और एक प्रायोजित सोच से चलने वाले कुछ तथाकथित राजनेताओं की साजिश के शिकार उन असंख्य हिन्दू वीरों में से एक हैं राजा कृष्णदेव राय जी
===========================================
हममे से सभी ने बचपन में तेनालीराम और राजा कृष्णदेव राय की कहानियां पढ़ी है लेकिन हम इसे हलकी फुलकी कामेडी के रूप में लेते आये है बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी थी की वो १ महान साम्राज्य के महान राजा के बारे में पढ़ रहे थे .
माधवाचार्य विद्यारन्य– पूरे भारत में शायद ही कोई इनका नाम जानता होगा कुछ इतिहास कारों को छोड़कर , माधवाचार्य का जन्म १३वि शताब्दी में दक्षिण भारत में हुआ था पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद भी भारत के मूर्ख राजाओं ने कोई सबक नहीं सीखा ,और पृथ्वीराज के बाद ,कन्नौज ,गुजरात और फी दक्षिण भारत के राजा १-१ कर के अलाउद्दीन खिलजी के हाथों पराजित होते रहे. उन मूर्खों ने कभी नहीं सोचा की आपस में लड़ने के बजाय अगर वो १ होकर मुकाबला करते तो अपने सबसे बड़े दुश्मन को देश से बाहर कर सकते थे . दक्षिण भारत के पतन के बाद वहां के बहुत सारे सेनापति और अन्य सेना भी बलात मुस्लिम बना ली गयी. इन्ही में से २ सेनापति थे हरिहर और बुक्का राय ,जो की मुस्लिम बन चुके थे माधवाचार्य विद्यारान्य ने हरिहर और बुक्का राय को वापस हिन्दू धर्म में दीक्षित करके उनको १ नए साम्राज्य के स्थापना की प्रेरणा दी १३१३ इसवी में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई विजयनगर साम्राज्य महाराजा क्र्श्नदेव राय के समय अपनी सर्वाधिक उचाईयों पर पहुँच गया १३१३ से लेकर १५६५ इसवी तक दक्षिण भारत के तमाम मुस्लिम सुल्तानों ने कई बार विजयनगर पर हमला किया परन्तु हर बार उन्हें हार कर भागना पढ़ा हालत ये हो गए दक्षिण में इस्लामिक राज्य के पैर उखाड़ने लगे .
तालीकोटा का युध — तालीकोटा का युद्ध कहानी है शौर्य की वीरता की महानता की धोखे की कमीनेपन और नीचता की और ये कहानी उन सेकुलर कीड़ों के लिए भी है जो अपनी आँख पर हरा चस्मा लगाये बैठे है . तालीकोटा का युद्ध १५६५ में विजयनगर और ५ सुल्तानों की संयुक्त सेना का युद्ध था विजयनगर की ताकत से दक्षिण का इस्लामी राज्य को उखड़ते देख जिहाद का नारा देकर १ बड़ी सेना को युद्ध के लिए तैयार किया गया , विजयनगर की सेना रामराया के हाथ में थी (हालाँकि रामराया की उम्र ७० साल हो चुकी थी ) रामराया जैसा की हिन्दू हमेशा से करते आये है १ धर्मपरायण परन्तु धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति था. उसने २ मुसलमान बच्चों को गोद लिया था जिनको न सिर्फ अपने पुत्र की तरह पाला अपितु उन्हें सेना की बड़ी टुकड़ी का सेनापति भी बनाया, जिसमे अधिकांस सैनिक परिवर्तित मुसलमान थे . तालीकोटा के युद्ध की शुरुवात में विजयनगर की सेनाओं के भीषण प्रहार से जब आदिलशाही और संयुक्त सुल्तानों की सेना बिखर कर भागने लगी तभी रामराया के गोद लिए मुस्लिम सेनापति पुत्रों ने पीछे से से अपने उस बाप पर हमला किया जिसने उन्हें जिंदगी दी थी ,हमले में रामराया की मृत्यु होते ही विजय के कगार पर कड़ी विजयनगर साम्रज्य की सेना में भगदड़ मच गयी और संयुक्त सुल्तानों की सेना को जीत हासिल हुई .इसके बाद हमेशा की तरह अपनी शांतिप्रिय परंपरा का पालन करते हुए ,इस्लामिक सेना ने विजयनगर की राजधानी हम्पी को आग लगा दी और आम नागरिकों की हत्या की तथा औरतों को लूट लिया गया . इस युद्ध के बाद भी बच खुचे विजयनगर के सीनों और इस्लामिक आर्मी के बीच युद्ध चलता रहा जो की तिरुमाला मंदिर पर हमले में वेंकट २ के द्वारा ५०,००० इस्लामिक योधाओं की मौत से जाकर बंद हुआ .
अब तो ये बचे हुए लुप्त गौरव के अवशेष हैं
✍🏻 अरुण डी
Comments
Post a Comment