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Showing posts from April 16, 2017

कश्मीर के इस शौर्य को इतिहास के पन्नों पर लिखा गया था महाराजा संग्रामपीड द्वितीय के शासनकाल में।

©Copyright मनीषा सिंह की कलम से कश्मीर के इस शौर्य को इतिहास के पन्नों पर लिखा गया था महाराजा संग्रामपीड द्वितीय के शासनकाल में। कश्मीर के कर्कोटक नागवंशी राजपूत राजा संग्रामपीड द्वितीय 57वर्ष तक शासन किया इस शूरवीर राजा ने कश्मीर प्रदेश पर 672 ई. से लेकर 729 ई. तक राज्य किया, ये ललितापिड के पुत्र थे (ललितापिड को ललितादित्य समझने की भूल ना करे दोनों अलग हैं इतिहाकारों ने ये गलती किया हैं दोनों को एक समझकर गलत इतिहास लिखा हैं बल्कि दोनों के समय में बहोत अंतर हैं सम्राट ललितादित्य के छठी पीढ़ी राजा थे ललितापिड जो संग्रामपीड के पिताश्री थे) । अरण्यक साम्राज्य भी कश्मीर के राजपूत राजाओ के साम्राज्य का हिस्सा था जिसपर कई इस्लामिक हमले हुए और क्रूरतम आक्रमण हुए अरण्य साम्राज्य पर आक्रमण करने से पूर्व उसके आसपास के गाँव, राज्य इत्यादि सब जला देते थे तहस-नहस कर देते थे भाड़ी लूट मार मचाते हुए अरण्यक की और बढ़ते थे पर कभी जीत नही पाए थे अरण्यक (वर्त्तमान ईरान) को कर्कोटक वंश के इतिहास भी मिलता हैं Thabit Abdullah (Civilizations of Central Asia, Chapter 14) ने भी इस किताब में राजपूत शासनकाल क...

👉 धर्म का पवित्र प्रवाह

👉 धर्म का पवित्र प्रवाह  सुनील कुमार! 👉 धर्म का पवित्र प्रवाह 🔵 धर्म तो गंगा का पवित्र प्रवाह है, जिसका स्पर्श अन्तःकरण में निर्मलता का शीतल अहसास जगाता है। अपनी छुअन से औरों को निर्मल करने वाला धर्म खुद मलिन कैसे हो सकता है? वह भला भ्रष्ट किस तरह हो सकता है? विधर्मियों द्वारा पवित्र स्थल, धार्मिक स्थल, धर्म आदि को भ्रष्ट किए जाने की बातें बच्चों का बचपना ही तो हैं। इन्हें सुनकर समझ में नहीं आता कि हँसें या रोएँ। हकीकत में ऐसी बातों से धर्म को तो कुछ नहीं होता; हाँ! अपना अहम् और अपनी स्वार्थी भावनाएँ जरूर जख्मी होती हैं। 🔴 स्वधर्मी और विधर्मी-ये सम्भव ही नहीं। धर्म के विधर्म जैसा कुछ भी नहीं होता। इस दुनिया में सूर्य एक है, धरती एक है तो भला धर्म दो, तीन या पाँच किस तरह हो सकते हैं? वास्तव में अज्ञान और अधर्म के लिए संख्या की कोई सीमा ही नहीं है। जितने चाहो, जितनी तरह के चाहो, उतने गिन लो।    🔵 समूचे विश्व में क्या कोई ऐसा भी इनसान है, जो साँस में कार्बन डाइऑक्साइड लेता हो, कानों से देखता हो और आँखों से सुनता हो। है क्या कोई ऐसा मनुष्य? यथार्थ में ऐसा सम्भ...

भारतीय गाय स्त्रियां ओर समाज

भारतीय स्त्रियां तो जब रसोई में भोजन प्रसादी बनाती है तो सबसे पहले गऊ की रोटी बनाती है तथा नित्य गाय को रोटी खिलाती है! अनेक समर्थ श्रद्धालु जन समर्थानुसार गौशालाओ में पल रही गायों के लिए चारा भूषा की ब्यवस्था करते है! गाय की उत्पत्ति के बिषय में एक बार महर्षि नारद ने भगवन नारायण से प्रश्न किया तो भगवान नारायण ने बताया की हे नारद ! गौमाता का प्राकट्य भगवान श्रीकृष्ण के वाम भाग से हुआ है! उन्होंने बताया कि एक समय की बात है भगवान श्रीकृष्ण राधा गोपियों से घिरे हुए पुण्य बृंदाबन में गए, और थके होने से वे एकांत में बैठ गए। उसी समय उनके मन में दूध पीने की इच्छा जागृत हुई, तो उन्होंने अपने बाम भाग से लीला पूर्वक ''सुरभि गौ '' को प्रकट किया । उस गौ के साथ बछड़ा भी था और सुरभि के थनो में दूध भरा था! उसके बछड़े का नाम ''मनोरथ ''था! उस सुरभि गौ को सामने देख कर श्रीदामा जी ने एक नूतन पात्र पर उसका दूध दूहा!  वह दूध जन्म और मृत्यु को दूर करने वाला एक दूसरा अमृत ही था !स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उस स्वादिस्ट दूध को पिया! भगवान नारायण ने आगे देवर्षि नारद जी...

वाराहमूल (बारामूला), ऋषि कश्यप, कल्हण और कश्मीर...

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वाराहमूल (बारामूला), ऋषि कश्यप, कल्हण और कश्मीर... Written by:- जवाहरलाल कौल मान्यता है कि अति प्राचीन काल में कश्मीर घाटी एक विशाल सरोवर थी – सती सर यानी पार्वती का सर। चारों ओर से घिरी झील के पहाड़ी किनारों पर कुछ पशुपालक जातियां रहतीं थी, जिनका जीवनयापन भेड़-बकरी, गाय भैंस आदि को पालने से होता था। संभवत: थेाडी बहुत खेती बाड़ी भी होती हो। पानी के स्रोतों से इनके लगाव से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन सरोवर में रहने वाले एक दैत्य या राक्षस जलोद्भव के कारण उनका जीवन कष्टमय हो गया था। यह दैत्य प्राय: उनकी बस्तियों पर आक्रमण करके उनके पशु उठाकर ले जाता था। कभी कभी मनुष्यों को भी मारता था। इस प्रकार की यातना से तंग आकर वे लोग मध्यदेश (वर्तमान उत्तर प्रदेश और बिहार) में कहीं निवास करने वाले ऋषि कश्यप के पास गए और उनसे सहायता की याचना की। कश्यप ने अपने शिष्यों के साथ राक्षस से मुक्ति दिलाने की योजना बनाई। राक्षस जलोद्भव मारा गया और बारामूला जिसे वराहमूल कहा जाता था, पर्वतीय प्राचीर में सेंध लगा कर पानी का निकालने का मार्ग बनाया गया। पानी निकल गया और बहुत बड़ी घाटी प्रकट हो...

🌿 *समझदार मौन होकर न बैठे*🌿

❄❄❄❄❄❄❄ ❄❄❄❄❄❄❄❄❄ 🙏🙏🙏                 ‼ *प्रणाम*‼             ❗ *ऋषि चिंतन*❗     🌿 *समझदार मौन होकर न बैठे*🌿 👉 *धर्मक्षेत्र को आज हेय इसलिए समझा जाता है कि उसमें ओछे और अवांछनीय व्यक्तित्व भरे पड़े हैं। उन्होंने धर्म को बदनाम किया है।* इतनी उपयोगी एवं उत्कृष्ट आस्था के प्रति लोगों को नाक-भों सिकोड़ने पड़ रहे हैं। *इस स्थिति को बदलने का एक ही उपाय है कि बढ़िया लोग उस क्षेत्र में प्रवेश करें। इससे धर्म के प्रति फैली हुई अनास्था भी दूर होगी और उसे ढोंग न समझकर आस्थाओं का प्रशिक्षण समझा जाने लगेगा।* 👉 *योजनाएँ कितनी ही आकर्षक क्यों न हों उनको आगे धकेलने वाले लोग जब आदर्शहीन, स्वार्थी और संकीर्ण दृष्टिकोण के हों तो उनकी दृष्टि उस योजना से अधिकाधिक अपना लाभ लेने की होगी।* इस विचित्रता में कोई योजना सफल नहीं हो सकती। कोई भी महान् कार्य सदा आदर्शवादी आस्था लेकर चलने वाले लोग ही पूरा करते हैं। *यदि इसी विशेषता का अभाव रहा तो फिर योग्यता, शिक्षा तथा कौशल कितना ही बढ़ा-चढ़ा हो वह व्यक्तिगत लाभ की ओर ही झुकेग...

ग्रामीण विरासतों की एक तस्वीर

‼🐚‼🐚🙏🐚‼🐚‼  दादी माँ बनाती थी.. रोटी !! पहली.. गाय की , और  आखरी.. कुत्ते की..! हर सुबह.. नन्दी आ जाता था , दरवाज़े पर.. गुड़ की  डली के लिए..! कबूतर का.. चुग्गा ,         चीटियों.. का आटा..! शनिवार, अमावस, पूर्णिमा का सीधा.. सरसों का तेल , गली में.. काली कुतिया के ब्याने पर.. चने गुड़ का प्रसाद..! सब कुछ.. निकल आता था ! वो भी उस घर से.., जिसमें.. भोग विलास के नाम पर.. एक टेबल फैन भी न था..! आज.. सामान से.. भरे घरों में.. कुछ भी.. नहीं निकलता ! सिवाय लड़ने की.. कर्कश आवाजों के.! ....हमको को आज भी याद है - मकान चाहे.. कच्चे थे लेकिन रिश्ते सारे.. सच्चे थे..!! चारपाई पर.. बैठते थे , दिल में प्रेम से.. रहते थे..! सोफे और डबल बैड.. क्या आ गए ?      दूरियां हमारी.. बढा गए..! छतों पर.. सब सोते थे ! बात बतंगड.. खूब होते थे..! आंगन में.. वृक्ष थे , सांझे.. सबके सुख दुख थे..! दरवाजा खुला रहता था , राही भी.. आ बैठता था...! कौवे छत पर.. कांवते थे मेहमान भी.. आते जाते थे...! एक साइकिल ही.. पास था , फि...

आरएसएस में ऐसा क्या है जो नौजवानों को आकर्षित करता है

नज़रिया: आरएसएस में ऐसा क्या है जो नौजवानों को आकर्षित करता है प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हाराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक 17 अप्रैल 2017 समकालीन भारत में राजनीतिक बदलाव के पीछे हिन्दुत्व की विचारधारा और उसके वाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निर्विवादित रूप से केन्द्रीय भूमिका है. यह बदलाव असाधारण है. इसने न सिर्फ स्थापित राजनीति को निष्प्रभावी किया बल्कि वैकल्पिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टिकोणों को बढ़ती हुई स्वीकृति के साथ स्थापित करने का काम किया. भारत में वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कोई नई बात नहीं है. जिन्हें यह परिवर्तन अचानक और अप्रत्याशित लगता है वे सम्भवतः देश के भीतर दशकों से हो रहे ज़मीनी स्तर के बदलाव को न समझ पाए हैं और न ही आज भी समझने की कोशिश कर रहे हैं. संघ के प्रभाव के पीछे बीस के दशक से ही पीढ़ी दर पीढ़ी युवाओं का आकर्षण रहा है. आज इसे भारत के युवाओं का भारी समर्थन मिला हुआ है. स्वभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि कथित रूप से प्रगतिशीलता, बदलाव और क्रांति की बात करने वाली विचारधाराएं हाशिए पर क्यों चली गईं ? और जिन्हें वे पश्चिम ...

दिनचर्या

Ple 5 mint nikaalo share ple *1. सुबह उठ कर कैसा पानी पीना चाहिए*     उत्तर -     हल्का गर्म *2.  पानी पीने का क्या तरीका होता है*     उत्तर -    सिप सिप करके व नीचे बैठ कर *3. खाना कितनी बार चबाना चाहिए*      उत्तर. -    32 बार *4.  पेट भर कर खाना कब खाना चाहिए*      उत्तर. -     सुबह *5.  सुबह का नाश्ता कब तक खा लेना चाहिए*      उत्तर. -    सूरज निकलने के ढाई घण्टे तक *6.  सुबह खाने के साथ क्या पीना चाहिए*          उत्तर. -     जूस *7.  दोपहर को खाने के साथ क्या पीना चाहिए*     उत्तर. -     लस्सी / छाछ *8.  रात को खाने के साथ क्या पीना चाहिए*     उत्तर. -     दूध *9.  खट्टे फल किस समय नही खाने चाहिए*     उत्तर. -     रात को *10. आईसक्रीम कब खानी चाहिए*        उत्तर. -     ...

नकारात्मकता का भारतीय व्यवस्थाओं में प्रभाव जो जनता सकारात्मक} सोचती है

लेख से पहले आपको एक सच्ची कहानी सुनाना चाहता हूँ। हमारे देश में एक महान वैज्ञानिक हुए हैं प्रो. श्री जगदीश चन्द्र बोस। भारत को और हम भारत वासियों को उन पर बहुत गर्व है। इन्होने सबसे पहले अपने शोध से यह निष्कर्ष निकाला कि मानव की तरह पेड़ पौधों में भी भावनाएं होती हैं। वे भी हमारी तरह हँसते खिलखिलाते और रोते हैं। उन्हें भी सुख दुःख का अनुभव होता है। और श्री बोस के इस अनुसंधान की तरह इसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। श्री बोस ने शोध के लिये कुछ गमले खरीदे और उनमे कुछ पौधे लगाए। अब इन्होने गमलों को दो भागों में बांटकर आधे घर के एक कोने में तथा शेष को किसी अन्य कोने में रख दिया। दोनों को नियमित रूप से पानी दिया, खाद डाली। किन्तु एक भाग को श्री बोस रोज़ गालियाँ देते कि तुम बेकार हो, निकम्मे हो, बदसूरत हो, किसी काम के नहीं हो, तुम धरती पर बोझ हो, तुम्हे तो मर जाना चाहिए आदि आदि। और दूसरे भाग को रोज़ प्यार से पुचकारते, उनकी तारीफ़ करते, उनके सम्मान में गाना गाते। मित्रों देखने से यह घटना साधारण सी लगती है। किन्तु इसका प्रभाव यह हुआ कि जिन पौधों को श्री बोस ने गालियाँ दी वे मुरझा गए और जिनकी त...