भारतीय इतिहास का विकृतिकरण 6
भारतीय इतिहास का विकृतिकरण
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विदेशी पर्यटकों के विवरणों की प्रामाणिकता
भारतीय संस्कृति की विशिष्टताओं से प्रभावित होकर, भारतीय साहित्य की श्रेष्ठताओं से मोहित होकर और भारत की प्राचीन कला, यथा- मन्दिरों, मूर्तियों, चित्रों आदि से आकर्षित होकर समय-समय पर भारत की यात्रा के लिए आने वाले विदेशी पर्यटकों के यात्रा वृतान्तों पर भारत के इतिहास के संदर्भ में आधुनिक विदेशी और देशी इतिहासकारों ने भारत में विभिन्न स्रोतों से सुलभ सामग्री की तुलना में अधिक विश्वास किया है। जबकि यह बात जगजाहिर है कि मध्य काल में जो-जो भी विदेशी पर्यटक यहाँ आते रहे हैं, वे अपने एक उद्देश्य विशेष को लेकर ही आते रहे हैं और अपनी यात्रा पर्यन्त वे उसी की पूर्ति में लगे भी रहे हैं। हाँ, इस दौरान भारतीय इतिहास औरपरम्पराओं के विषय में इधर-उधर से उन्हें जो कुछ भी मिला, उसे अपनी स्मृति में संजो लिया और यात्रा-विवरण लिखते समय स्थान-स्थान पर उसे उल्लिखित कर दिया है।
इन विदेशी यात्रियों के वर्णनों के संदर्भ में विदेशी विद्वान ए. कनिंघम का यह कथन उल्लेखनीय है-
“In this part of the pilgrim’s travels, the narativ e is frequetly imperfect and erroneous and we must, therefore, trust to our own sagacity, both to supply his omissions and to correct his mistakes.”
-- (‘एनशिएन्ट ज्योग्रेफी ऑफ इण्डिया‘ (1924) पृ. 371 - पं. कोटावेंकटचलम कृत ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘ पृ. 20 पर उद्धत)
वैसे तो भारत-भ्रमण के लिए अनेक देशों से यात्री आते रहे हैं। फिर भी भारत के इतिहास को आधुनिक रूप से लिखते समय मुख्यतः यूनानी और चीनी-यात्रियों के यात्रा-विवरणों को अधिक प्रमुखता दी गई है। उनके सम्बन्ध में स्थिति इस प्रकार है-
यूनानी यात्री
यूनान देश से आने वालों में अधिकतर तो सिकन्दर केआक्रमण के समय उसकी फौज के साथ आए थे या बाद में भारतीय राजाओं के दरबार में राजदूत के रूप में नियुक्त होकर आए थे। इनमें से मेगस्थनीज और डेमाकस ही अधिक प्रसिद्ध रहे। मेगस्थनीज की मूल पुस्तक ‘इण्डिका‘ ही नहीं वरन उसके समकालीन अन्य इतिहासकारों की रचनाएँ भी काफी समय पूर्व ही नष्ट हो चुकी थीं। उनकी फटी-पुरानी पुस्तकों से और अन्य लेखकों की रचनाओं से लिए गए उद्धरणों और जनता की स्मृति में शेष कथनों को लेकर जर्मन विद्वान श्वानबेक द्वारा लिखित पुस्तक के अनुवाद में दिए गए ब्योरों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि वे किसी जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा गम्भीरता से लिखे गए हैं। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
�मेगस्थनीज ने एक स्थान पर कहा है कि भारत में लड़कियाँ सात वर्ष की आयु में विवाह और सन्तानोत्पत्ति के योग्य हो जाती हैं। (‘मेगस्थनीज का भारत विवरण‘, पृ. 153-154)
मेगस्थनीज ने यह भी कहा है कि काकेशस के निवासी सबके सामने स्त्रियों से संगम करते हैं और अपने सम्बन्धियों का मांस खाते हैं।इन दोनों प्रथाओं का उल्लेख हेरोडोटस ने भी किया है। (‘मेगस्थनीज का भारत विवरण‘, पृ. 40)
आचार्य रामदेव ने अपने ग्रन्थ ‘भारतवर्ष का इतिहास‘ के तृतीय खण्ड के अध्याय 5 में मेगस्थनीज के लेखन के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओरध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में यूनानी राजदूत के रूप में भारत आया था अतः उसका परिचय आचार्य चाणक्य से अवश्य ही रहा होगा क्योंकि वे सम्राटचन्द्रगुप्त के गुरु और महामंत्री, दोनों ही थे। ऐतिहासिक दृष्टि से दोनों की समसामयिकता को देखतेहुए ऐसा सोच लेना भी स्वाभाविक ही है कि तत्कालीन भारतवर्ष के सम्बन्ध में इन दोनों विद्वानों ने जो कुछ भी लिखा होगा, उसके ब्योरों में समानता होगी किन्तु मेगस्थनीज के विवरण चाणक्य के ‘अर्थ शास्त्र‘ से भिन्न ही नहीं विपरीत भी है। यही नहीं, मेगस्थनीज के विवरणों में चाणक्य का नाम कहीं भी नहीं दिया गया है।
चीनी यात्री
भारत आने वाले चीनी यात्रियों की संख्या वैसे तो 100मानी जाती है किन्तु भारतीय इतिहास-लेखन में तीन, यथा- फाह्यान, ह्वेनसांग औरइत्सिंग का ही सहयोग प्रमुख रूप से लिया गया है। इनके यात्रा विवरणों के अनुवाद हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में सुलभ हैं। इन अनुवादों में ऐसे अनेक वर्णन मिलते हैं जो लेखकों के समय के भारत के इतिहास की दृष्टि से बड़े उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण हैं। आधुनिक रूप में भारत का इतिहास लिखने वालों ने इन तीनों यात्रियों द्वारा वर्णित अधिकांश बातों को सत्य मानकर उनके आधार पर भारत की विभिन्न ऐतिहासिकघटनाओं के विवरण लिखे हैं किन्तु उनके वर्णनों में सभी कुछ सही और सत्य हैं, ऐसा नहीं है। उनके वर्णनों में ऐसी भी बातें मिलती हैं, जो अविश्वसनीय लगती हैं। ऐसा लगता है कि वे सब असावधानीमें लिखी गई हैं। तीनों के विवरणों की स्थिति इस प्रकार है-
फाह्यान - यह भारत में जितने समय भी रहा, घूमता ही रहा। चीन लौटने पर इसने अपनी यात्रा के वर्णन लिपि-बद्ध कर दिए। श्री जगन्मोहन वर्मा द्वाराचीनी से हिन्दी में अनूदित पुस्तक में, जिसे नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया है, कई जगह पर लिखा मिलता है कि ‘‘यह सुनी हुई बात पर आधारित है‘‘ आखिर यह ‘सुनना‘ किस भाषा में हुआथा ? क्या स्थानीय भाषाओं का उसका ज्ञान इतना पुष्ट था कि सामान्य लोगों की बातों को उसने समझ लिया था ? किसी भी विदेशी के लिए इतनी जल्दी भारत जैसे बहुभाषी देश की विभिन्न भाषाओं कोज्ञान प्राप्त कर लेना एक असंभव कार्य था जबकि उसके द्वारा लिखे गए विवरणों में विभिन्न स्थानों के अलग-अलग लोगों की स्थिति का उल्लेख मिलता है। यदि ऐसा नहीं था तो उसने जो कुछ लिखा है क्या वह काल्पनिक नहीं है ? संभव है इसीलिए इन विवरणों के सम्बन्ध में कनिंघम को सन्देह हुआ है।
ह्वेनसांग- यह हर्षवर्धन के समय में भारत में बौद्ध धर्म के साहित्य का अध्ययन करने आया था और यहाँ 14 वर्ष तक रहा था। उसने भारत में दूर-दूर तक भ्रमण किया था। उसने भारत के बारे में चीनी भाषा में बहुत कुछ लिखा था। बील द्वारा किए गएउसके अंग्रेजी अनुवाद से ज्ञात होता है कि उसने अपनी भाषा में भारत के समस्त प्रान्तों की स्थिति, रीति-रिवाज और सभ्यता, व्यवहार, नगरों और नदियों की लम्बाई-चौड़ाई तथा अनेक महापुरुषों के सम्बन्ध में विचार प्रकट किए हैं लेकिन यहाँ भी वही प्रश्न उठता है कि उसने विभिन्न भारतीय भाषाओं का ज्ञान कब, कहाँ और कैसे पाया ? यह उल्लेख तो अवश्य मिलता है कि उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में रहकर संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया था किन्तु सामान्य लोगों से उसका वार्तालाप संस्कृत में तो हुआ नहीं होगा, तबवह उनके रीति-रिवाजों के बारे में इतनी बातें कैसे जान पाया होगा ?
भारत के आधुनिक रूप में लिखित इतिहास में अनेक ब्योरे और निष्कर्ष ह्वेनसांग के वर्णनों को प्रमाणिक मानकर उनके आधार पर दिए गए हैं। इसके लेखों के बारे में कनिंघम का कहना है कि यह मानना होगा कि ह्वेनसांग के लेखों में बहुत सी बातें इधर-उधर की कही गई बातों के आधार पर कल्पित हैं। इसलिए वे गलत और असम्बद्ध हैं। अतः उसने जो कुछ लिखा है, उसे एकदम सत्य और प्रामाणिक मान लेना उचित नहीं है। इसीलिए कनिंघम ने यह सलाह दीहै कि इतिहास लिखते समय हमें उसमें उचित संशोधन करने होंगे। (पं. कोटावेंकटचलम कृत ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘, पृ. 20 पर उद्धृत)
इत्सिंग - इत्सिंग ने नालन्दा में 675 से 685 ई. तक रहकर लगभग दस वर्ष तक अध्ययन किया था। इस अवधि में उसने 400 ग्रन्थों का संकलन भी किया था। 685 ई. में उसने अपनी वापसी यात्रा शुरू की। मार्ग में रुकता हुआ वह 689 ई. के सातवें मास मेंकंग-फूं पहुँचा। इत्सिंग ने अपने यात्रा विवरण पर एक ग्रन्थ लिखा था, जिसे 692 ई. में ‘श्रीभोज‘ (सुमात्रा में पलम्बंग) से एक भिक्षुक के हाथ चीन भेज दिया था। जबकि वह स्वयं 695 ई. के ग्रीष्म काल में ही चीन वापस पहुँचा था।
अपने यात्रा-विवरण में उसने भी बहुत सी ऐसी बातें लिखी हैं जो इतिहास की कसौटी पर कसने पर सही नहीं लगतीं। इत्सिंग ने प्रसिद्ध विद्वान भर्तृहरि को अपने भारत पहुँचने से 40 वर्ष पूर्व हुआ माना है। जबकि ‘वाक्यपदीय‘ के लेखक भर्तृहरि काफी समय पहलेहुए हैं। इसी प्रकार उसके द्वारा उल्लिखित कई बौद्ध विद्वानों की तिथियों में भी अन्तर मिलता है। इन अन्तरों के संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इत्सिंग द्वारा 691-92 ई. में चीन भेजी गई सामग्री 280 वर्ष तक तो हस्तलिखित रूप में ही वहाँ पड़ी रही। 972 ई. तक वह मुद्रित नहीं हुई। फिर जो पुस्तक छपी उसमें और मूल सामग्री, जो इत्सिंग ने भेजी थी, में अन्तर रहा। (‘इत्सिंग की भारत यात्रा‘, अनुवादक सन्तराम बी. ए. पृ. ज्ञ-30) ऐसा भी कहा जाता है कि इत्सिंग ने स्वयं अपनी मूल प्रति में चीन पहुँचने पर संशोधन कर दिए थे। जो पुस्तक स्वयं में ही प्रामाणिक नहीं रही उसके विवरण भारत के इतिहास-लेखन के लिए कितने प्रामाणिक हो सकते हैं, यह विचारणीय है।
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रघुनन्दन प्रसाद शर्मा✍🏻
कल बात करेंगे अनुवादों की प्रमाणिकता की .....
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विदेशी पर्यटकों के विवरणों की प्रामाणिकता
भारतीय संस्कृति की विशिष्टताओं से प्रभावित होकर, भारतीय साहित्य की श्रेष्ठताओं से मोहित होकर और भारत की प्राचीन कला, यथा- मन्दिरों, मूर्तियों, चित्रों आदि से आकर्षित होकर समय-समय पर भारत की यात्रा के लिए आने वाले विदेशी पर्यटकों के यात्रा वृतान्तों पर भारत के इतिहास के संदर्भ में आधुनिक विदेशी और देशी इतिहासकारों ने भारत में विभिन्न स्रोतों से सुलभ सामग्री की तुलना में अधिक विश्वास किया है। जबकि यह बात जगजाहिर है कि मध्य काल में जो-जो भी विदेशी पर्यटक यहाँ आते रहे हैं, वे अपने एक उद्देश्य विशेष को लेकर ही आते रहे हैं और अपनी यात्रा पर्यन्त वे उसी की पूर्ति में लगे भी रहे हैं। हाँ, इस दौरान भारतीय इतिहास औरपरम्पराओं के विषय में इधर-उधर से उन्हें जो कुछ भी मिला, उसे अपनी स्मृति में संजो लिया और यात्रा-विवरण लिखते समय स्थान-स्थान पर उसे उल्लिखित कर दिया है।
इन विदेशी यात्रियों के वर्णनों के संदर्भ में विदेशी विद्वान ए. कनिंघम का यह कथन उल्लेखनीय है-
“In this part of the pilgrim’s travels, the narativ e is frequetly imperfect and erroneous and we must, therefore, trust to our own sagacity, both to supply his omissions and to correct his mistakes.”
-- (‘एनशिएन्ट ज्योग्रेफी ऑफ इण्डिया‘ (1924) पृ. 371 - पं. कोटावेंकटचलम कृत ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘ पृ. 20 पर उद्धत)
वैसे तो भारत-भ्रमण के लिए अनेक देशों से यात्री आते रहे हैं। फिर भी भारत के इतिहास को आधुनिक रूप से लिखते समय मुख्यतः यूनानी और चीनी-यात्रियों के यात्रा-विवरणों को अधिक प्रमुखता दी गई है। उनके सम्बन्ध में स्थिति इस प्रकार है-
यूनानी यात्री
यूनान देश से आने वालों में अधिकतर तो सिकन्दर केआक्रमण के समय उसकी फौज के साथ आए थे या बाद में भारतीय राजाओं के दरबार में राजदूत के रूप में नियुक्त होकर आए थे। इनमें से मेगस्थनीज और डेमाकस ही अधिक प्रसिद्ध रहे। मेगस्थनीज की मूल पुस्तक ‘इण्डिका‘ ही नहीं वरन उसके समकालीन अन्य इतिहासकारों की रचनाएँ भी काफी समय पूर्व ही नष्ट हो चुकी थीं। उनकी फटी-पुरानी पुस्तकों से और अन्य लेखकों की रचनाओं से लिए गए उद्धरणों और जनता की स्मृति में शेष कथनों को लेकर जर्मन विद्वान श्वानबेक द्वारा लिखित पुस्तक के अनुवाद में दिए गए ब्योरों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि वे किसी जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा गम्भीरता से लिखे गए हैं। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
�मेगस्थनीज ने एक स्थान पर कहा है कि भारत में लड़कियाँ सात वर्ष की आयु में विवाह और सन्तानोत्पत्ति के योग्य हो जाती हैं। (‘मेगस्थनीज का भारत विवरण‘, पृ. 153-154)
मेगस्थनीज ने यह भी कहा है कि काकेशस के निवासी सबके सामने स्त्रियों से संगम करते हैं और अपने सम्बन्धियों का मांस खाते हैं।इन दोनों प्रथाओं का उल्लेख हेरोडोटस ने भी किया है। (‘मेगस्थनीज का भारत विवरण‘, पृ. 40)
आचार्य रामदेव ने अपने ग्रन्थ ‘भारतवर्ष का इतिहास‘ के तृतीय खण्ड के अध्याय 5 में मेगस्थनीज के लेखन के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओरध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में यूनानी राजदूत के रूप में भारत आया था अतः उसका परिचय आचार्य चाणक्य से अवश्य ही रहा होगा क्योंकि वे सम्राटचन्द्रगुप्त के गुरु और महामंत्री, दोनों ही थे। ऐतिहासिक दृष्टि से दोनों की समसामयिकता को देखतेहुए ऐसा सोच लेना भी स्वाभाविक ही है कि तत्कालीन भारतवर्ष के सम्बन्ध में इन दोनों विद्वानों ने जो कुछ भी लिखा होगा, उसके ब्योरों में समानता होगी किन्तु मेगस्थनीज के विवरण चाणक्य के ‘अर्थ शास्त्र‘ से भिन्न ही नहीं विपरीत भी है। यही नहीं, मेगस्थनीज के विवरणों में चाणक्य का नाम कहीं भी नहीं दिया गया है।
चीनी यात्री
भारत आने वाले चीनी यात्रियों की संख्या वैसे तो 100मानी जाती है किन्तु भारतीय इतिहास-लेखन में तीन, यथा- फाह्यान, ह्वेनसांग औरइत्सिंग का ही सहयोग प्रमुख रूप से लिया गया है। इनके यात्रा विवरणों के अनुवाद हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में सुलभ हैं। इन अनुवादों में ऐसे अनेक वर्णन मिलते हैं जो लेखकों के समय के भारत के इतिहास की दृष्टि से बड़े उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण हैं। आधुनिक रूप में भारत का इतिहास लिखने वालों ने इन तीनों यात्रियों द्वारा वर्णित अधिकांश बातों को सत्य मानकर उनके आधार पर भारत की विभिन्न ऐतिहासिकघटनाओं के विवरण लिखे हैं किन्तु उनके वर्णनों में सभी कुछ सही और सत्य हैं, ऐसा नहीं है। उनके वर्णनों में ऐसी भी बातें मिलती हैं, जो अविश्वसनीय लगती हैं। ऐसा लगता है कि वे सब असावधानीमें लिखी गई हैं। तीनों के विवरणों की स्थिति इस प्रकार है-
फाह्यान - यह भारत में जितने समय भी रहा, घूमता ही रहा। चीन लौटने पर इसने अपनी यात्रा के वर्णन लिपि-बद्ध कर दिए। श्री जगन्मोहन वर्मा द्वाराचीनी से हिन्दी में अनूदित पुस्तक में, जिसे नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया है, कई जगह पर लिखा मिलता है कि ‘‘यह सुनी हुई बात पर आधारित है‘‘ आखिर यह ‘सुनना‘ किस भाषा में हुआथा ? क्या स्थानीय भाषाओं का उसका ज्ञान इतना पुष्ट था कि सामान्य लोगों की बातों को उसने समझ लिया था ? किसी भी विदेशी के लिए इतनी जल्दी भारत जैसे बहुभाषी देश की विभिन्न भाषाओं कोज्ञान प्राप्त कर लेना एक असंभव कार्य था जबकि उसके द्वारा लिखे गए विवरणों में विभिन्न स्थानों के अलग-अलग लोगों की स्थिति का उल्लेख मिलता है। यदि ऐसा नहीं था तो उसने जो कुछ लिखा है क्या वह काल्पनिक नहीं है ? संभव है इसीलिए इन विवरणों के सम्बन्ध में कनिंघम को सन्देह हुआ है।
ह्वेनसांग- यह हर्षवर्धन के समय में भारत में बौद्ध धर्म के साहित्य का अध्ययन करने आया था और यहाँ 14 वर्ष तक रहा था। उसने भारत में दूर-दूर तक भ्रमण किया था। उसने भारत के बारे में चीनी भाषा में बहुत कुछ लिखा था। बील द्वारा किए गएउसके अंग्रेजी अनुवाद से ज्ञात होता है कि उसने अपनी भाषा में भारत के समस्त प्रान्तों की स्थिति, रीति-रिवाज और सभ्यता, व्यवहार, नगरों और नदियों की लम्बाई-चौड़ाई तथा अनेक महापुरुषों के सम्बन्ध में विचार प्रकट किए हैं लेकिन यहाँ भी वही प्रश्न उठता है कि उसने विभिन्न भारतीय भाषाओं का ज्ञान कब, कहाँ और कैसे पाया ? यह उल्लेख तो अवश्य मिलता है कि उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में रहकर संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया था किन्तु सामान्य लोगों से उसका वार्तालाप संस्कृत में तो हुआ नहीं होगा, तबवह उनके रीति-रिवाजों के बारे में इतनी बातें कैसे जान पाया होगा ?
भारत के आधुनिक रूप में लिखित इतिहास में अनेक ब्योरे और निष्कर्ष ह्वेनसांग के वर्णनों को प्रमाणिक मानकर उनके आधार पर दिए गए हैं। इसके लेखों के बारे में कनिंघम का कहना है कि यह मानना होगा कि ह्वेनसांग के लेखों में बहुत सी बातें इधर-उधर की कही गई बातों के आधार पर कल्पित हैं। इसलिए वे गलत और असम्बद्ध हैं। अतः उसने जो कुछ लिखा है, उसे एकदम सत्य और प्रामाणिक मान लेना उचित नहीं है। इसीलिए कनिंघम ने यह सलाह दीहै कि इतिहास लिखते समय हमें उसमें उचित संशोधन करने होंगे। (पं. कोटावेंकटचलम कृत ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘, पृ. 20 पर उद्धृत)
इत्सिंग - इत्सिंग ने नालन्दा में 675 से 685 ई. तक रहकर लगभग दस वर्ष तक अध्ययन किया था। इस अवधि में उसने 400 ग्रन्थों का संकलन भी किया था। 685 ई. में उसने अपनी वापसी यात्रा शुरू की। मार्ग में रुकता हुआ वह 689 ई. के सातवें मास मेंकंग-फूं पहुँचा। इत्सिंग ने अपने यात्रा विवरण पर एक ग्रन्थ लिखा था, जिसे 692 ई. में ‘श्रीभोज‘ (सुमात्रा में पलम्बंग) से एक भिक्षुक के हाथ चीन भेज दिया था। जबकि वह स्वयं 695 ई. के ग्रीष्म काल में ही चीन वापस पहुँचा था।
अपने यात्रा-विवरण में उसने भी बहुत सी ऐसी बातें लिखी हैं जो इतिहास की कसौटी पर कसने पर सही नहीं लगतीं। इत्सिंग ने प्रसिद्ध विद्वान भर्तृहरि को अपने भारत पहुँचने से 40 वर्ष पूर्व हुआ माना है। जबकि ‘वाक्यपदीय‘ के लेखक भर्तृहरि काफी समय पहलेहुए हैं। इसी प्रकार उसके द्वारा उल्लिखित कई बौद्ध विद्वानों की तिथियों में भी अन्तर मिलता है। इन अन्तरों के संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इत्सिंग द्वारा 691-92 ई. में चीन भेजी गई सामग्री 280 वर्ष तक तो हस्तलिखित रूप में ही वहाँ पड़ी रही। 972 ई. तक वह मुद्रित नहीं हुई। फिर जो पुस्तक छपी उसमें और मूल सामग्री, जो इत्सिंग ने भेजी थी, में अन्तर रहा। (‘इत्सिंग की भारत यात्रा‘, अनुवादक सन्तराम बी. ए. पृ. ज्ञ-30) ऐसा भी कहा जाता है कि इत्सिंग ने स्वयं अपनी मूल प्रति में चीन पहुँचने पर संशोधन कर दिए थे। जो पुस्तक स्वयं में ही प्रामाणिक नहीं रही उसके विवरण भारत के इतिहास-लेखन के लिए कितने प्रामाणिक हो सकते हैं, यह विचारणीय है।
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रघुनन्दन प्रसाद शर्मा✍🏻
कल बात करेंगे अनुवादों की प्रमाणिकता की .....

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