कोलंबिया का एक अखबार था “एल एस्पक्टाडोर”, जिसमें 1955 ने चौदह दिनों की एक सीरीज छपनी शुरू हुई |

कोलंबिया का एक अखबार था “एल एस्पक्टाडोर”, जिसमें 1955 ने चौदह दिनों की एक सीरीज छपनी शुरू हुई | ये सीरीज एक सत्य घटना पर लिखी जा रही थी | सीरीज का हीरो एक करीब बीस साल का नौजवान लुइस अलेक्सान्द्रो वेल्साको, होता है | ये कहानी इसलिए महत्वपूर्ण हो गई थी क्योंकि ये सरकारी बयानों से बहुत अलग थी | सरकारी बयानों में एक ऐसा तूफ़ान गढ़ा गया था, जो कि कभी आया ही नहीं था | सच्चाई ये थी कि जहाज पर तस्करी का माल इतना लाद दिया गया था कि वो डूब गया |

असली कहानी ये थी कि वेल्साको अमेरिका से अपने जहाज पर लौट रहे थे | कई दिनों बाद अपने देश लौटने की सब नाविकों को जल्दी भी थी | जहाज पर औकात से ऊपर तस्करी का माल लादकर जहाज को रवाना किया गया था | कर्रिबियन में लहरें ऊँची होती हैं, और जहाज पर वजन ज्यादा था | संभालने की कोशिश में वेल्साको के आठ साथी बह गए और जहाज डूब गया | कोलंबिया की नौ सेना ने चार दिन तलाश की और सभी लापता नाविकों को मृत मानकर खोज बंद कर दी |

मगर लुइस वेल्सांको के हाथ कुछ टूटी फूटी सी एक लाइफबोट आ गई थी और वो बच गया था | चार दिन तक जो तलाश करने का बहाना हुआ उसमें भी कुछ तो किया नहीं गया था ! तो वेल्साको भूखा प्यासा अपनी टूटी नाव पर बहता रहा | किसी तरह दस दिन बाद वो जिस किनारे पर पहुंचा किस्मत से वो कोलंबिया था | समंदर से जिन्दा बच निकले इसी नाविक की असली कहानी लिखकर लेखक ने छाप दी थी | जाहिर है सरकार की पोल खोल देने वाली इस कहानी के छपते ही उन्हें स्थानीय पत्रकार से विदेशी संवाददाता हो जाना पड़ा | तथाकथित समाजवादी-साम्यवादी सरकारों को भी अपनी पोल खोलने वाले पसंद नहीं आते |

खैर ये कहानी पहले तो स्पेनिश में ही छपी थी, मगर कई साल बाद (1970 में) इसे एक किताब की शक्ल दी गई | कुछ साल और बीतने पर रैन्डोल्फ होगन ने (1986 में) इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया | नोबल पुरस्कार से सम्मानित गैब्रिअल ग्रेसिया मार्क्वेज़ की ये किताब थी “स्टोरी ऑफ़ अ शिपव्रेकड सेलर” जो पहले कभी अखबार के लेखों का सीरीज थी | मार्क्वेज़ ने किताब के अधिकार भी उस नाविक लुइस वेल्साको को दे दिए थे | खुद किताब की रॉयल्टी नहीं ली |

बाद में किताब का अंग्रेजी अनुवाद जब खूब चला तो इस नाविक ने मार्क्वेज़ पर उसके अधिकार के लिए भी मुकदमा ठोक दिया | मतलब जिसे उसने ना लिखा, ना अनुवाद किया, ना कुछ उसके उसे पैसे भी चाहिए थे | वैसे तो जहाज डूबने की कहानी डेनियल डेफो के रोबिनसन क्रुसो के दौर से ही प्रसिद्ध हैं | वोल्टायर ने कैंडिड, उम्बरटो एको की द आइलैंड ऑफ़ द डे बिफोर, जे.एम. कोट्जी की फो भी इसी विषय पर हैं | लेकिन मार्क्वेज़ ने एक सत्य घटना को एक किस्से की तरह सुनाया और वो उनकी किताब को ख़ास बनाता है |

भारत की बहुसंख्यक आबादी को देखेंगे तो ये स्टोरी ऑफ़ शिपव्रेकड सेलर की कहानी काम की कहानी है | अच्छा किस्सा गढ़ने वाला, जैसे रविश कुमार, जैसे देवदत्त पटनायक, कितने हैं भारत की “बहुसंख्यक”, बोले तो हिन्दुओं की ओर से जो कहानी सुना सकें ? कोई नाम याद आता है क्या ? अब ये तो जाहिर बात है कि हमलावर सामी मजहब और रिलिजन जहाँ गए वहां से उन्होंने स्थानीय धर्मों को समूल ख़त्म कर दिया | अगर भारत के एक छोटे से हिस्से में हिन्दू बहुसंख्यक हैं (सात राज्यों में नहीं है) तो जाहिर है हमने लड़ाइयाँ जीती भी होंगी |

सभी हारे होते तो निपटा दिए गए होते | गोवा इनक्वीजिशन के फ्रांसिस ज़ेवियर जैसे सरगना पानी पी पी कर ब्राह्मणों को कोसते पाए जाते हैं, क्योंकि उनके होते वो लोगों को इसाई नहीं बना पा रहे थे | रानी पद्मावती पर चित्तौड़ वाला हमला आखरी तो नहीं था | भंसाली द मुग़ल ने तो हाल में ही किला घेरने की कोशिश की है | चमचों के लिए हम-आप सब बरसों “चारण-भाट” जुमले का इस्तेमाल करते रहे हैं | एक बार इतिहास पलटते ही पता चल जाता है कि चारण-भाट तो गला कटने की स्थिति में भी बिलकुल झूठ ना बोलने वाले लोग थे ! उनके कांग्रेसी टाइप होने की तो संभावना ही नहीं है ?

सवाल ये है कि हम अपने पक्ष के किस्से सुनाने वाले कब ढूँढेंगे ? हज़ार वर्षों से हमलों के सामने प्रतिरोध की क्षमता ना छोड़ने वाले हिन्दुओं की कहानी लिखने वालों को पब्लिक कब ढूंढेगी ? शिकार की कहानियों में शिकारी का महिमामंडन तो खूब पढ़ लिया | हे महामूर्ख, हिन्दुओं आप अपने पक्ष की कहनी सुनाने वालों को कब ढूंढेंगे ?

आनंद कुमार

Comments

Popular posts from this blog

आदि शंकराचार्य के शिष्य विश्व विजेता सम्राट सुधन्वा चौहान -

🌅 *फेंगशुई एक धोखा, भारत को बचाइए* 🌅

👉 युग बदल रहा है-हम भी बदलें