झूठा वैराग्य







👉 झूठा वैराग्य

 सुनील कुमार!

👉 झूठा वैराग्य

🔵 कितने ऐसे मनुष्य हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करतेउनके भीतर किसी भी मौलिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दयनिर्भय,निष्ठुर होते हैं। निस्संदेह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों सेमुसीबतों सेबच जाते हैंकिन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता,कोई वेदना नहीं होतीलेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर से कर सकते हैंजो वज्र वत कठोर हृदय होते हैंनितान्त एकाकी होते हैंवे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा जीवन भी भला कोई जीवन हैवैरागी वह है जो सब प्रकार से संसार में रह करसब तरह के कार्यक्रम को पूरा करसब की सेवा करसबसे प्रेम करफिर भी सबसे अलग रहता है।
🔴 हम लोगों को यह एक विचित्र आदत सी पड़ गई है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने पड़ते हैंजो भी कठिनाइयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैंउनके लिए हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरे के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। संसार बुरा है,नारकीय हैभले लोगों के रहने की यह जगह नहीं हैयह हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं। यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होतायदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायेगा कि यदि हम स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आप का वास असंभव था। हम बुरे हैं तो संसार भी बुरा प्रतीत होगा लेकिन लोग वैराग्य का झूठा ढोल पीटकर अपने को अच्छा और संसार को बुरा बताने की आत्म वंदना किया करते हैं।
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 5

Comments

Popular posts from this blog

आदि शंकराचार्य के शिष्य विश्व विजेता सम्राट सुधन्वा चौहान -

🌅 *फेंगशुई एक धोखा, भारत को बचाइए* 🌅

👉 युग बदल रहा है-हम भी बदलें