पुरुखों की गौरव गाथा है, सपनों का यह व्यापार नहीं।

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कविता
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पुरुखों की गौरव गाथा है, सपनों का यह व्यापार नहीं।
इतिहास कलंकित करने का,देंगे तुमको अधिकार नहीं।।

इक वो संजय था जिसने,सच को सच कह कर बतलाया था।
अंधे  के  सम्मुख  भी  अपना, नैतिक  कर्तव्य  निभाया था।।
पर  कलियुग  में झूठी लीला, करने  इक संजय फिर  आया।
अपने  सपनों  के   चित्रों  हित, पर्दा  आँखों  पर  चढ़वाया।।
हर युग  में  करते  दु:शासन, माँ-बहनों   का  यूं  चीर हरण।
शायद खिलजी  के सपनों का, तुम करते  ऐसा ही चित्रण ।।
कामुकता के व्यापारी  तुम, खिलजी  को लायक  बना रहे।
जो वहशी  और  दरिंदा था, उसको  तुम  नायक  बना रहे।।
         ऐसे   कुत्सित   व्यवहारों  का, होगा कोई सत्कार नहीं।।
         इतिहास कलंकित करने का,देंगे तुमको अधिकार नहीं।।

सपनों  के  गंदे  सौदागर, तुम  भूले  जौहर  ज्वाला   को।
मर्यादा  की  रक्षा  के  हित, लड़ती  क्षत्राणी  बाला   को।।
तुम भूल गए चित्तौड़ दुर्ग, जिसका कण-कण समरांगण है।
बलिदानों का जहां अमर नाद, वीरों के पौरुष का प्रण है।।
कूदी थी  जिसमें पद्मिनियां, वो राख  अभी तक गर्म यहां।
सतियों का सत लज्जित करते, ना आई तुमको शर्म यहां।।
भारत  की  गौरव  थाती  को, बदनाम   नहीं   करने  देंगे।
कापुरुषों  को  कापुरुषों हित, हम काम  नहीं  करने देंगे।।
        धिक्कारेंगे उन  कृत्यों को, जिनका कोई  आधार नहीं।।
        इतिहास कलंकित करने का,देंगे तुमको अधिकार नहीं।।
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रचयिता- डाॅ.कैलाश मण्डेला
              गीतकार
            संपर्क -09828233434
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