चन्देल वंश मध्यकालीन भारत का प्रसिद्ध राजवंश

मनीषा सिंह की कलम से
चन्देल वंश मध्यकालीन भारत का प्रसिद्ध राजवंश। जिसने 8वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से यमुना और नर्मदा के बीच, बुंदेलखंड तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर राज किया । चंदेल वंश के शासकों का बुंदेलखंड के इतिहास में विशेष योगदान रहा है । उन्हों ने लगभग चार शताब्दियों तक बुंदेलखंड पर शासन किया । चन्देल शासक न केवल महान विजेता तथा सफल शासक थे, अपितु कला के प्रसार तथा संरक्षण में भी उनका महत्वकपूर्ण योगदान रहा । चंदेलों का शासनकाल आमतौर पर बुंदेलखंड के शांति और समृद्धि के काल के रूप में याद किया जाता है । चंदेलकालीन स्थाणपत्यन कला ने समूचे विश्व  को प्रभावित किया उस दौरान वास्तुकला तथा मूर्तिकला अपने उत्करर्ष पर थी । इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं खजुराहो के मंदिर । चंदेल वंश के अति पराक्रमी लाहौर तक साम्राज्य विस्तार किये थे महराजा विद्याधर चंदेल ।
चंदेल राजपूत राजा विद्याधर की पराक्रम और शौर्य की गाथा लाहौर तक फैली हुई थी यह सत्य हैं भारत वर्ष के योद्धाओं के साथ जो अन्याय किया गया हैं केवल दो पन्नों में समेट दिया गया वीरो की गाथा चंदेल वंशीय राजपूतों ने शेर शाह , ऐबक , गज़नी , हुमायूँ को परास्त कर उलटे पैर वापस लौटने पर विवश कर दिया था । समस्त इतिहास को विलुप्त कर दिया गया जिस वजह से हम इतिहास में केवल दो पन्नों में सिमट गये ।
चंदेल वंशीय राजपूत के बारे में कई विदेशी इतिहासकारो ने इनके पराक्रम , शौर्य का उल्लेख अपने अपने ग्रंथो में किया पर भारत के धर्मनिरपेक्ष हराम में उत्पत्ति हुए इतिहासकारों ने हिन्दू राजाओ की शौर्य का व्याख्यान करना इन शाही हरम से निकले इतिहासकारों के लिए अपने मुग़ल मालिकों के प्रति गद्दारी होगा , इसलिए इतिहास में हिन्दू योद्धाओं को हारा हुआ घोषित कर इन्होंने अपने मुग़ल मालिकों के प्रति वफादारी दिखाया ।
विद्याधर (1018 - 1029) चन्देल वंश का सबसे प्रतापी राजा था जिसने खजुराहो का कन्दारिया महादेव मंदिर बनवाया था। मुसलमान लेखक उसको 'चन्द्र' एवं 'विदा' नाम से पुकारते हैं। वह अपने दादा (धंग) के सामान वीर और कुसल शासक था। अली इब्न उल-अतहर (Ali ibn al-Athir) के अनुसार विद्याधर के राज्य सीमा की सीमा भारत में सबसे
बड़ी थी ।
कालिंजर का युद्ध सन 1019 ईस्वी में महमूद गज़नवी ने चंदेल राजपूतो का किला कालिंजर पर घेरा डाल दिया था ७३,००० के लूटेरो की सेना जब चंदेल राजा विद्याधर अपने अत्याल्प सेना के साथ रणभूमि पर भीषण संघर्ष हुआ ग़ज़नवी विद्याधर की सेना की मृत्यु तांडव देख ग़ज़नवी की सेना में हड़कंप मच गया अत्यन्त कुशल योद्धा होने का प्रमाण देते हुए पराक्रमी प्रतापी राजा विद्याधर एवं उनके सेना ने ग़ज़नवी की सेना को कालिंजर से भागने पर विवश कर दिया था ।
सन 1022 ईस्वी हार का बदला लेने हेतु महमूद ग़ज़नवी दोबारा कालिंजर पर चढ़ाई किया विद्याधर चंदेल ने महमूद ग़ज़नवी की सेना इस बार दुगनी ताक़त के साथ हमला किया था पर विद्याधर चंदेल की पहचान उनकी भुजाबल एवं तलवार की धार थी जिससे उन्होंने लाहौर से बगदादी को खदेड़ कर भगवा परचम लहराया था । जब शेरों ने शिकार करना आरंभ किया सियारों की टोली में हड़कंप फिर मचने लगा तभी विद्याधर चंदेल ने कायर गज़नी के टांगो पर तलवार से प्रहार किया जिससे उन्हें फिर अपने प्राणों में संकट नज़र आने लगा तब जीवन बचने हेतु हार स्वीकार करते हुए संधि नामा पर हस्ताक्षर कर कालिंजर से सेना हटा ने का वादा किया एवं यह भी संधि किया महमूद खुद या महमूद के किसी साथी ने अगर कालिंजर पर आक्रमण करता हैं तो संधि अनुसार ग़ज़नी पर भी कालिंजर शासक विद्याधर का अधिकार होगा ।
इस युद्ध में गज़नी को भाड़ी क्षति उठानी पड़ी गज़नी के ५५,००० अश्व सेना , २७,००० पैदल सेना एवं १५ हाथी के साथ सेना थी गज़नी का अश्व सेना में से महज कुछ हज़ार सैन्य बचे थे , पैदल सेना कुछ सौ हज़ार जीवित बचे थे हाथी सेना कालिंजर पर चढ़ाई करने से पहले ही मारे जा चुके थे ।
कालिंजर शासक विद्याधर को अत्याल्प क्षति उठानी पड़ी परन्तु गज़नी का सुल्तान तबाह हो चूका था हार के बाद संधि अनुसार ३००० की हर्जाना भी भड़ना पड़ा जिसके बारे में मुस्लिम इतिहासकार अबू गार्डिजी ने भी उलेख किया हैं ।
वैसे इस इतिहास को भारतीय इतिहासकारों ने कभी भारतीय इतिहास पर अंकित नहीं किया परंतु यह सत्य हैं चंदेल राजपूत ने तुर्को , गज़नी , गुलाम वंश , शेर शाह , मुग़ल से युद्ध कर उन्हें परास्त किया इसका वर्णन मुस्लिम इतिहासकार , विदेशी लेखको ने किया हैं ।
ऐसे ही एक मुस्लिम इतिहासकार ने इस युद्ध का वर्णन करते हुए कहा हैं
ग़ज़नवी का कालिंजर असफल अभियान ---
मुस्लिम लेखक “ अबू गाडिर्जी” ने अपनी किताब” जैनुल अकबर “में लिखा है कि 1019 में कालिंजर पर आक्रमण में राजपूतों ने इतना प्रबल युद्ध किया की महमूद को उलटे पांव वापस गजनी जाना पड़ा 1022 ईसवीं. में महमूद फिर इस हार का बदला लेने के लिए गजनी से चला, रास्ते में ग्वालियर पर चार दिन चार रात घेरा डालने पर भी जीत की सम्भावना न देख , हार कर वह कालिंजर के लिए आगे बढ़ गया , कालिंजर का किला इतनी ऊंचाई पर था कि उस पर सीधे आक्रमण करना संभव नहीं था न ही आधार के पत्थर काटकर घुसा जा सकता था गाडिर्जी आगे लिखता है कि महमूद ने विद्याधर चंदेल के समक्ष आत्मसमर्पण कर ३००० की हर्जाना भेट किया और गजनी प्रस्थान किया यह मुस्लिम लेखको द्वारा अपने संरक्षकों को ” हारा हुआ” न दिखाने का तरीका था महमूद को” दो बार” हराने के बाद विद्याधर ने खजुराहो में कंदारिया महादेव का मंदिर बनवाया । खजुराहों, भारत के मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के पास स्थित एक शहर है। खजुराहों का प्राचीन नाम खजूरपुरा और खजूरवाहिका था। कहा जाता है कि इस नगर के द्वार पर खजूर के पेड़ थे, जिस वजह से इसका नाम खजुराहों रखा गया। यहाँ हिन्दूओं के बहुत से ऐतिहासिक मंदिर है, जिसके लिए यह शहर प्रसिद्ध है। यह भारत में विश्व के यूनेस्को (UNESCO) धरोहर स्थलों में से एक है। यहाँ के मंदिर प्रतीकात्मक वास्तुकला सम्बन्धी नागरा – शैली और एरोटिक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। यह पत्थरों से बने मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है । खजुराहों के मंदिरों का निर्माण चंदेल वंश के समय सन 950 से सन 1050 में हुआ। खजुराहों के इतिहास के अनुसार 12वीं शताब्दी में यहाँ लगभग 85 मंदिरों का निर्माण हुआ, जोकि 20 किमी तक फैले हुए है. आधुनिक समय में यहाँ सिर्फ 20 मंदिर ही जीवित है, जोकि 6 किमी तक ही फैले हुए है. इन सभी मंदिरों में से, कंदारिया महादेव मंदिर की सजावट प्राचीनतम भारतीय शिल्प की प्रतीकात्मकता और जटिल जानकारी के साथ की गई है। यहाँ बहुत से मंदिरों का निर्माण हुआ है, लेकिन यहाँ के मंदिर हिन्दूओं को समर्पित है।

कंदारिया महादेव मंदिर – यह मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में सबसे बड़ा भगवान शिव का मंदिर है. इस मंदिर की भव्यता और सुन्दरता के लिए यह प्रसिद्ध है. इस मंदिर को चंदेल राजा विद्याधर ने महमूद गजनी से युद्ध में, विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था. तांत्रिक लोगों को प्रसन्न करने के लिए, इस मंदिर का निर्माण हुआ. यह मंदिर लगभग 107 फिट ऊँचा है. इस मंदिर की विशेषता मकर तोरण है. यह मंदिर खजुराहों के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस तरह खजूराहों के मंदिर बहुत सी प्रसिद्ध और अदभुत संरचना से भरपूर हैं. यहाँ भारी संख्या में लोग आते है. मंदिरों की अप्रतिम प्रतिभा देखकर मन को आनंद का अनुभव होने लगता है.
संदर्भ-:
१) डाइनैस्टिक हिस्ट्री ऑव इंडिया, भाग 2
२) अजेय कालिंजर - डॉ. शरद सिंह
३) भारत के ऐतिहासिक किले-३

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