भारत के राजनेतिक दासता का सबुत

🚩 🙏 *।।वन्दे मातरम्।।* 🙏 🚩
*जब तक इंडियन पुलिस एक्ट नही बदला जाता तब तक शहिदों की आत्मा को शांति नही मिलेगी।*

*इस अँग्रेज़ी पुलिस क़ानून के तहत लाला लाजपत राय की हत्या हुई. सरदार भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव जैसे तीन क्रांतिकारियों को फाँसी चढ़ना पड़ा; उस मूल क़ानून को आज़ादी मिलते ही जला देना चाहिए था, पूरी तरह से ख़त्म हो जाना चाहिए था. लेकिन आज़ादी  के 70 साल के बाद भी ये क़ानून चल रहा है और इस क़ानून में कोई बदलाव नही हुआ है. आज भी पुलिस उसी तरह से व्यवहार करती है, पहले अंग्रेज क्रांतिकारियों पर लाठी चलाते थे आज पुलिस साधारण लोगों पर लाठी चलती है. आज भी पुलिस की लाठियों से लोगों के सर फटते हैं; लोगों के पैर टूटते है. आज भी पुलिस की गोलियों से लोगों की जाने जाती है और इस देश के लोग बिना किसी वजह के अपनी शहादत देते है. तब मैं अपने आप से पूछता हूँ की क्या आज़ादी आ गयी  है?*

*क्या स्वराज की स्थापना हो गई है? अगर अँग्रेज़ी क़ानून 1860 में चलता था और 1947 तक चलता रहा है। अब वह 2017 में भी चल रहा है तो कैसे कहें की आज़ादी आई है? कैसे कहें कि स्वराज्य आ गया है? अब तो बहुत अफ़सोस है कि पहले गोरे अँग्रेज़ों की पुलिस लाठी मारकर लहुलुहांन करती थी; अब काले अँग्रेज़ों की पुलिस है जो भारत वासियों को लाठी मारकर लहूं लुहान करती है।*

*अंतर बस इतना है पहले गोरे अँग्रेज़ों के आदेश पर होता था आज काले अँग्रेज़ों के आदेश पर होता है. काम तो वही होता है. कई बार मेरा दिल रोता है. कई ऐसी घटनाए होती है. कुछ दिन पहले एक घटना घटित हुई दिल्ली मैं. मैं दूरदर्शन पर समाचार देख रहां था।  कुछ अंधे लोगो की संस्थाओं ने अपनी माँग सरकार के सामने प्रस्तुत करने के लिए जुलूस निकाला. दिल्ली मैं एक स्थान है जिसका नाम है जंतर मंतर, आज कल सारे जुलूस जंतर मंतर पर निकलते है और वहीं ख़तम हो जाते हैं; उससे आगे जाने नही देते है. तो जंतर मंतर पर अंधे लोगों के संस्था जिसका नाम है “राष्ट्रीय अंध संस्था” उनकी तरफ से जुलूस निकाला गया. अंधे व्यक्ति देख नही सकते इसलिए हर अंधे व्यक्ति के साथ एक ऐसा व्यक्ति था जो देख सकता था. वे अपनी छोटी  सी मांग प्रस्तुत कर रहे थे,  सरकार के सामने।*

*माँग क्या थी की अंधे लोगों को यात्रा करते हुए टिकिट पर मिलने वाली छुट उस सहयोगी को भी मिले जो उनकी सहयता के लिए यात्रा करता है. कोई बड़ी माग नही थी, साधारण सी माग थी. इस माँग को प्रस्तुत करने के लिए अंधे लोग इकट्ठे हुए और हमारे काले अँग्रेज़ों की सरकार ने वर्बरता से लाठियाँ  चलाई जिसमें 17 अंधे लोगों के सिर फॅट गये; लहू लुहान  हो गये क्योंकि अंधे लोग तो अपनी जान बचाने के लिए भाग नहीं सकते क्योंकि वो देख नही सकते, ऐसी पुलिस  की हमारी व्यवस्था है. उस दिन मैने अपने आप से पूछा कि क्या देश आज़ाद हो गये है? क्या हम स्वतंत्र  हो गए है क़ानून तो वही चल रहा है; व्यवस्था तो वही चल रही है।*

*एक और घटना सुनाता हूँ, एक बार विकलांगो ने अपनी कुछ  माँगों को  लेकर प्रदर्शन किया; जिनके पैर  पोलियो ग्रस्त थे. आप जानते है जिनके पाँव  पोलियो ग्रस्त होते है वो हाथ से साइकिल चलाकर अपन काम चलाते है. तो हाथ से साइकिल रिक्शा सैकड़ो मील चला करके लोग इकट्ठे हुए, अपनी माँगो को प्रस्तुत करने के लिए. पुलिस ने उन पर भी लाठियाँ चलाईं. उनकी साइकलें तोड़ी गयी, उनके सिर फोड़े गये उनकी टांगे  तोड़ी गयी।*

*और एक घटना सुनता हूँ, भारत में एक राज्य है, राजस्थान। थोड़े साल पहले तक वहाँ पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी, वहाँ की मुख्यमंत्री थी बसुंधरा राजे सिंधिया. वसुंधर राजे शिंधिया सरकार ने राजस्थान मैं एक फ़ैसला किया. फ़ैसला क्या किया की गाँव- गाँव में शराब की दुकाने खोली जाएँ. ये फ़ैसला उस सरकार का था जो भारतीय संस्कृति की बात करती है, जो सभ्यता की बात करती है, जो राष्ट्रीयता की बात करती हैं. हर गाँव  में शराब की दुकान खोली जाए; हर व्यक्ति को शराब में डुबो दिया जाए; ये उनकी नीति और ये उनका फ़ैसला. किसानों ने इसका विरोध किया. किसानों ने कहा हमें गाँव में शराब नही चाहिए; हमें पीने के लिए और खेत के लिए पानी चाहिए.. हमें पीने को पानी मिले और खेतों के लिए पानी मिले इसकी व्यवस्था सरकार करें वहाँक तक तो ठीक है हमें शराब नही चाहिए।*

*परिणाम क्या हुआ किसानों ने अपनी इस माँग को लेकर रैली निकाली और बसुंधरा सरकार ने उस रैली के उपर गोली चलवाई और 14 किसांन एक ही दिन में तत्काल मारे गये. ऐसी है हमारी पुलिस व्यवस्था और ऐसी है हमारी राज्य व्यवस्था. अहंकार और मद में चूर कोई मुख्यमंत्री इस मूर्खता के फ़ैसले  के साथ अपने आप को प्रस्तुत करे तो ऐसों को तो मुख्यमंत्री पहले बनना ही नही चाहिए, और बने तो कान पकड़ कर उनको नीचे ही उतार देना चाहिए; उनको बिठा कर रखने की कोई ज़रूरत नही है।*

*पर मुद्दे की बात ये है कि राष्ट्रीयता और संस्कृति की बात करने वाली सरकारें भी पुलिस का वैसा ही इस्तेमाल करती है जैसा अंग्रेज सरकरे करती थी. पुलिस उनके लिए वही है जो अँग्रेज़ों के लिए थी, लाठियाँ चलाने वाली, सिर फोड़ने वाली, गोलियाँ चलाने वाली।*

*एक और उदाहरण देता हूँ आपको पश्चिम बंगाल का, जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है. वहाँ पर एक छोटा  सा गाँव  है उसका नाम है सिंगूर. सिंगूर के किसानो से ज़मीने छीने गयी, ज़मीन बचाने के लिये  किसानॉ ने संघर्ष किया और अपने  आपको उन्होने पुलिस के सामने खड़ा पाया. तो बंगाल की सरकार ने भी पुलिस को वही आदेश दिया जो राजस्थान सरकार ने दिया था. गोली चलाओ लोगों को मार डालो; एक दिन के अंदर 17 लोगों की जाने गयी. 21 लोग अगले दिन मरे और गोलियाँ चला चला के लोगों को लहू लुहान कर दिया. बंगाल की सरकार ने जो अपने  आप को कम्मूनीस्ट कहते  है सर्वहारा वर्ग का  प्रतिनिधि कहती है. जो अपने आप को ग़रीबों का मसीहा कहतें है उनके राज्य में भी पुलिस ग़रीबों को ही मारती है. सर्वहरा को ही मारती है।*

*मतलब सीधा सा ये है राजस्थान की पुलिस हो या बंगाल की पुलिस चरित्र सबका एक ही है. बी जे पी के सरकार में घटना हो या कांम्युनिस्ट सरकार में चरित्र सबका एक ही है, कानून एक ही है, व्यवस्था एक ही है, तरीके के एक ही है. इसलिए में कई बार अपने आप से पूछ लेता हूँ क्या देश आज़ाद हो गया है? जब अँग्रेज़ों के जमाने के क़ानून आज भी चल रहे है तो कैसे माने की हम आज़ाद हो गये है. जिससे क़ानून से लड़ते हुए शहीदे आज़म भगत सिंह ने अपनी जान दी  वो क़ानून अभी भी है. लाला लाजपत राय ने जिस अत्याचार को सहते हुए अपनी जान दी है वो क़ानून अभी भी जीवित है. जब तक ये इंडियन पुलिस एक्ट नही बदला जाता तब तक शहिदों की आत्मा को शांति नही मिलेगी और हम उन्हे श्रधांजलि भी नही दे पाएँगे।*
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        *www.rajivdixitmp3.com*

*Police ka Danda- Rajiv Dixit:* https://youtu.be/lCQPy6AL5uk
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